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Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

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| Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज के बारे में जानें:

सिन्धु घाटी सभ्यता (2500 ई.पू. से 1750 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। जो मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में, जो आज तक उत्तर पूर्व अफगानिस्तान ,पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत में फैली है।  Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

यह सभ्यता प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता के साथ, यह प्राचीन दुनिया की सभ्यताओं के तीन शुरुआती कालक्रमों में से एक थी, और इन तीन में से, सबसे व्यापक तथा सबसे चर्चित। सम्मानित पत्रिका नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। यह हड़प्पा सभ्यता और ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के नाम से भी जानी जाती है।

Indus Valley Civilization map | सिन्धु घाटी सभ्यता मानचित्र

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7वी ई. पू. शताब्दी में पहली बार जब लोगों ने पंजाब प्रांत में ईटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहां से बनी बनाई इटे मिली जिसे लोगो ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता को खोजा।

कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बंधुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की। 1902 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग ( ASI, Archaeological Survey of India ) का महानिदेशक बनाया गया।

विकसित सैंधव सभ्यता | Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता:

‘भौगोलिक रूप-रेखा’ सैंधव सभ्यता की क्षेत्राकृति त्रिभुजाकार है तथा क्षेत्राफल 1299600 वर्ग किमी. है। इसकी उत्तरी सीमा जम्मू (मांडा), दक्षिणी सीम नर्मदा के मुहाने भगतराव, पूर्वी सीमा आलमगीरपुर (उ.प्र.) तथा पश्चिमी सीमा ब्लूचिस्तान के मकरान-सुत्कागेंडोर तक थी। यह उत्तर से दक्षिण तक 1100 किमी. तथा पूर्व से पश्चिम तक 1600 किमी. विस्तृत थी। Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

वर्तमान में पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत के क्षेत्रा सैंधव सभ्यता के प्रमुख क्षेत्रा थे। इस सभ्यता के अवशेष द. अफगानिस्तान, क्वेटा घाटी, मध्य तथा द. ब्लूचिस्तान, पंजाब-बहावलपूर तथा सिंधु क्षेत्रा में भी पाये गये हैं। सभ्यता की निम्नांकित विशेषताएं हैं।

समाज | Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता:

सैंधव समाज में कृषक, शिल्पकार, मजदूर वर्ग आदि सामान्य जन थे तथा पुरोहित, अधिकारी, व्यापारी व चिकित्सक आदि विशिष्ट जन थे। सबसे प्रभावशाली वर्ग व्यापारियों का था। दस्तकारों व कुम्हारों का विशेष स्थान था। योद्धा वर्ग के अस्तित्व का साक्ष्य नहीं मिलता है।

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यहां के लोग शांतिप्रिय थे। सैंधव समाज मातृप्रधान था। सामान्यतः लोग सूती वस्त्रा का उपयोग करते थे। पुरूष की प्रतिमाओं में ऊपरी भाग वस्त्रारहित दिखलाया गया है। पुरुष एवं स्त्राी आभूषणों का प्रचूर मात्रा में प्रयोग करते थे। समाज में नाई वर्ग का अस्तित्व था। सिंध तथा पंजाब के लोग गेहूं और जौ, राजस्थान के लोग जौ, गुजरात के रंगपुर के लोग चावल, बाजरा खाते थे।

अर्थव्यवस्था | Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता:

अधिकांश लोगों का मुख्य पेशा कृषि था। कपास की खेती का आरंभ सर्वप्रथम उन्हीं लोगों ने किया। इसलिए यूनानियों ने इस क्षेत्रा को ‘सिंडोन’ नाम दिया । यही सिंडोन बाद में सिन्धु नाम से जाना जाने लगा। मुख्य कृषि उत्पाद थे – खजूर, सरसों, मटर, बाजरा, कपास, केला, तरबुज, नारियल, जौ, तिल, अनार, गेहुँ, आदि।

गेहूँ की दो किस्में ट्रिटिकम कम्पैक्टम तथा ट्रिटिक्स स्फीरोकोकम प्राप्त हुई हैं। मुख्य रूप से जौ और गेहुँ की खेती की जाती थी। खेती के लिए लकड़ी का हल तथा फसल कटाई के लिए पत्थर के हंसिया का प्रयोग होता था। चावल के अवशेष रंगपुर तथा लोथल से प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से छः धारियों वाले जौ के साक्ष्य मिले हैं।

व्यापार-वाणिज्य | Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता:

व्यापार मुख्यतः विनिमय पद्धति से किया जाता था तथा तौल की इकाई संभवतः 16 के अनुपात में थी। मुख्य व्यापारिक नगर अथवा बंदरगाह थे- भगतराव, मुंडीगाक, बालाकोट, सुत्कागेंडोर, सोत्काकोह, मालवान, प्रभासपाटन, डाबरकोट। मेसोपोटामियाई वर्णित शहर मेलुहा सिंध क्षेत्रा का ही प्राचीन नाम है। मेसोपोटामिया (ईराक) सैंधव के विनिमय स्थल ‘दिलमुन’ और ‘माकन’ थे। दिलमुन संभवतः बहरीन द्वीप था। माकन संभवतः ओमान था।

उद्योग | Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता:

बर्तन बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण उद्योग था। अन्य महत्वपूर्ण उद्योग-धंधे बुनाई, मूद्रा निर्माण, मनका निर्माण, ईंट निर्माण, धातु उद्योग, मूर्ति निर्माण थे। गलाई एवं ढ़लाई प्रौद्योगिकी प्रचलित थी तथा धातुओं से लघु मूर्तियां बनाने के लिए मोम-सांचा-विधि प्रचलित था। वे लौ-प्रौद्योगिकी से अनजान थे परंतु तांबा में टिन मिलाकर कांस्य बनाना जानते थे। मोहनजोदड़ो से ईंट-भट्टों के अवशेष मिले हैं। मिट्टी के बर्तन सादे हैं एवं उन पर लाल पट्टी के साथ-साथ काले रंग की चित्राकारी है तथा तराजू, मछलियां, वृक्ष आदि के चित्रा हैं। Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

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कला तथा शिल्प:

Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यतासबसे प्रसिद्ध कलाकृति- मोहनजोदड़ो से प्राप्त नृत्य की मूद्रा में नग्न स्त्राी की कांस्य प्रतिमा है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त दाढ़ी वाले व्यक्ति की मूर्ति भी प्रसिद्ध कलाकृति है। संभवतः यह पुजारी की प्रतिमा है। अधिकतर मनके सेलखड़ी के बने हैं। सोने एवं चांदी के मनके भी पाऐ गये हैं। मोहनजोदड़ो से गहने भी पाए गए हैं। चन्हूदड़ों एवं लोथल में मनके बनाने के कारखाने थे। सैंधव नगरों से सिंह के चित्राण का साक्ष्य नहीं मिला है। सभी नगरों से टेरीकोटा की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं जैसे- बंदर, कुत्ता, वृषभ आदि क मृण्मूर्तियां। स्वस्तिक चिन्ह सैंधव सभ्यता की देन मान जाता है। गाय की मृण्मूर्ति नहीं मिली है। सुरकोतड़ा तथा मोहनजोदड़ो से बैल की मृण्मूर्ति मिली है।

मानवीय मृण्मूर्तियों में सबसे अधिक मृण्मूर्तियां स्त्रियों की हैं। हाथी दांत पर शिल्प कर्म के साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिले हैं। सैंधव सभ्यता के लोग सेलखड़ी, लालपत्थर, फीरोजा, गोमेद व अर्धकीमती पत्थर का उपयोग मनके बनाने में करते थे। ‘लिपि’ सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिन्ह एवं 250 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी के आयताकार महरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिले हैं। यह लिपि भाव चित्रात्मक थी। लिपि का सबसे ज्यादा प्रचलित चिन्ह मछली का है। सैंधव भाषा अभी तक अपठनीय है।

सैंधव लेख अधिकांशतः मुहरों पर ही मिले हैं। संभवतः इन मुहरों का उपयोग उन वस्तुओं की गांठ पर मुहर लगाने के लिए किया जाता था। जो निर्यात की जाती थीं। मुहरें बेलनाकार, वृत्ताकार, वर्गाकार तथा आयताकार रूप में हैं। अधिकांश  मुहरें सेलखड़ी की बनी हैं। विभिन्न स्थलों से दो हजार से ज्यादा मुहरें प्राप्त हुई है। मुहरों पर सर्वाधिक चित्रा एक सींग वाले सांड़ (वृषभ) की है। मुहरों पर मानवों एवं अर्द्धमानव के चित्रा भी हैं।

राजनीतिक संरचना:

प्रत्येक नगर (धौलावीरा को छोड़कर) के पश्चिमी भाग में दुर्ग होता था जहां प्रशासनिक या धार्मिक क्रियाकलाप किया जाता था। संभवतः वहां का शासन वणिक वर्ग के हाथों में था। हंटर महोदय के अनुसार शासन जनतंत्रात्मक था तथा पिग्गाट के अनुसार वहां पुरोहित वर्ग का पाभाव था।

नगर-योजना:

सैंधव सभ्यता की सबसे उत्कृष्ट विशेषता उसकी नगर योजना थी। उनके छः स्थलों को ही नगरों की संज्ञा दी जाती है- हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, चन्हूदड़ो, बनावली। नगरों की विशेषताएं-संरचना व बनावट में एकरूपता, दो भागों में विभाजित नगर संरचना(धौलावीरा को छोड़कर)। पश्चिमी भाग शासक वर्ग के लिए तथा पूर्वी भाग आमजन के लिए था। नगरों के सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी, लोथल को छोड़कर सभी नगरों के मकानों के मुख्य द्वार बगल की गलियों में खुलते थे। Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

मोहनजोदड़ो:

पुरातात्विक साक्ष्य एवं विशेषताएं- महास्नानागार, अन्नागार व सभाकक्ष के अवशेष, सड़क को पक्का करने के साक्ष्य, राज मूद्रांक, तीन बंदरों वाला मनका, कांस्य नर्तकी की प्रतिमा, सिपी के स्केल, तीन मुख वाले पुरुष की ध्यान की मुद्रा वाली मुहर। Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

हड़प्पा- यह पकिस्तान के पंजाब राज्य के मोंटगोमरी जिले में रावी नदीं के बायंे तट पर स्थित है। दो टीला पूर्वी एवं पश्चिमी भाग में है। यहां अन्नागार गढ़ी के बाहर है जबकि मोहनजोदड़ो में यह गढ़ी के अंदर बना है। भवनों में अलंकार और विविधता का अभाव है। प्राप्त वस्तुओं में पीतल की इक्का गाड़ी, शंख का बना बैल, संाप को दबाए गरुड़ चित्रित मुद्रा, स्त्राी के गर्भ से निकलता पौधे के चित्रा, कागज का साक्ष्य, शव के साथ बर्तन व आभूषण, मजदूरों के आवास।

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कालीबंगा:

कालीबंगा का अर्थ काली चूड़ियां होती है। इसका निचला शहर भी वृर्गीकृत है। यहां से सार्वजनिक नाली के साक्ष्य नहीं मिले हैं। Indus Valley Civilization | सिन्धु घाटी सभ्यता | हमारा इतिहास

विशेषताएं:

विशाल दुर्ग-दीवार के साक्ष्य, लकड़ी की नाली के साक्ष्य, लकड़ी के हल के साथ बुआई का साक्ष्य।

 

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